[Best] Chhattisgarhi Kavita Kosh – 2021 | छत्तीसगढ़ी कविता | CG Poem in Hindi | CG Kavita

[Best] Chhattisgarhi Kavita Kosh - 2021 छत्तीसगढ़ी कविता CG Poem in Hindi CG Kavita Chhattisgarhi hasya Kavita

Chhattisgarhi Kavita Kosh – दोस्तों अगर आप छत्तीसगढ़ी में कविताँए ढूंढ रहे है तो आप बिकुल सही वेबसाइट पर आए है। आज हम इस पोस्ट में कुछ ज़िंदगी के ऊपर बहुत ही लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी कविताएँ आपके साथ शेयर करने जा रहे है। इन कविता में कवि ने ज़िंदगी के बारे में कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण बातो का वर्णन किया है। 

कवि इन कविता के माधयम से हमको यह बताना चाहता है की हम अपनी ज़िंदगी को जीना ही भूल गए है। हम अपने रोज मर्रा के काम और दिन प्रतिदिन की भाग दौड़ में इतने वयस्थ हो गए है की अपनी ज़िंदगी को ठीक से कैसे जिए ये ही भूल जाते है। CG Kavita , CG Poems in Hindi , Chhattisgarhi Kavita Kosh , सीजी कविता, CG POEM 2021, छत्तीसगढ़ी कविताएँ.

इन सभी कविताओं के माध्यम से कवि हमे ज़िंदगी जीने का सही तरीका बताना चाहता है। सभी कवियों ने अपनी जिन्दगी को आधार मानकर कुछ बहुत ही  बेहतरीन CG Kavita on Life,पर कविताएँ लिखी है। कवियों ने अपनी एक ही कविता में जिन्दगी के बारे में सारी बाते कह डाली है।  यहाँ पर आपको निचे कुछ मशहूर कवियों की प्रसिद्ध लोकप्रिय और बेहतरीन Chhattisgarhi Poetry on Life कविताएँ निचे दी गई है। उम्मीद है की आपको ये  Chhattisgarhi Poem in Hindi, छत्तीसगढ़ी कविता आपको पसंद आएगी। अगर आपको यह कविताएँ पसंद आती है तो इन्हे अपने मित्रो के साथ जरूर शेयर करे। 


Chhattisgarhi Kavita Kosh – 2021


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Chhattisgarhi Kavita Kosh – 2021 छत्तीसगढ़ी कविता CG Poem in Hindi

हमर कतका सुन्दर गाँव – छत्तीसगढ़ी कविता



लेखक – स्व. प्यारेलाल गुप्ता जी

साहित्यकार एवं इतिहासविद् श्री प्यारेलाल गुप्ता जी का जन्म सन् 1948 में रतरपुर में हुआ था। गुप्तजी आधुनिक साहित्यकारों के “भीष्म पितामाह” कहे जाते हैं। उनके जैसे इतिहासविद् बहुत कम हुए हैं। उनकी “प्राजीन छत्तीसगढ़” इसकी साक्षी है।

साहित्यिक कृतियाँ – 1. प्राचीन छत्तीसगढ़ 2. बिलासपुर वैभव 3. एक दिन 4. रतीराम का भाग्य सुधार 5. पुष्पहार 6. लवंगलता 7. फ्रान्स राज्यक्रान्ति के इतिहास 8. ग्रीस का इतिहास 9. पं. लोचन प्रसाद पाण्डे ।

गुप्त जी अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी तीनों भाषाओं में बड़े माहिर थे। गांव से उनका बेहद प्रेम था। निम्नलिखित कविता में ये झलकती है

हमर कतका सुन्दर गांव –

हमर कतका सुन्दर गांव

जइसे लछमि जी के पांव

धर उज्जर लीपे पोते

जेला देख हवेली रोथे

सुध्धर चिकनाये भुइया

चाहे भगत परुस ल गूइया

अंगना मां बइला गरुवा

लकठा मां कोला बारी

जंह बोथन साग तरकारी

ये हर अनपूरना के ठांवा।। हमर

बाहिर मां खातू के गड्डा

जंह गोबर होथे एकट्ठा

धरती ला रसा पियाथे

वोला पीके अन्न उपयाथे

ल देखा हमर कोठार

जहं खरही के गंजे पहार

गये हे गाड़ा बरछा

तेकर लकठा मां हवे मदरसा

जहं नित कुटें नित खांय।। हमर

जहां पक्का घाट बंधाये

चला चला तरइया नहाये

ओ हो, करिया सफ्फा जल

जहं फूले हे लाल कंवल

लकठा मां हय अमरैया

बनवोइर अउर मकैया

फूले हय सरसों पिंवरा

जइसे नवा बहू के लुगरा

जंह घाम लगे न छांव।। हमर

जहाँ जल्दी गिंया नहाई

महदेव ला पानी चढ़ाई

भौजी बर बाबू मंगिहा

“गोई मोर संग झन लगिहा”

“ननदी धीरे धीरे चल

तुंहर हंडुला ले छलकत जल”

कहिके अइसे मुसकाइस

जाना अमरित चंदा बरसाइस

ओला छांड़ कंहू न जांव।। हमर

रवाथे रोज सोंहारी

ओ दे आवत हे पटवारी

झींटी नेस दूबर पातर

तउने च मंदरसा के माषृर

सब्बो के काम चलाथै

फैर दूना ब्याज लगाथै

खेदुवा साव महाजन

जेकर साहुन जइसे बाघिन

जह छल कपट न दुरांव।। हमर

आपस मां होथन राजी

जंह नइये मुकदमा बाजी

भेद भाव नइ जानन

ऊँच नीच नइ जानन

ऊँच नीच नइ मानन

दुख सुख मां एक हो जाथी

जइसे एक दिया दू बाती

चरखा रोज चलाथन

गाँधी के गुन-गाथन

हम लेथन राम के नावा।।

“प्राचीन छत्तीसगढ़” लिखते समय प्यारेलाल गुप्ता जी निरन्तर सात वर्ष तक कठिन परिश्रम की थी। इस ग्रन्थ में छत्तीसगढ़ के इतिहास, संस्कृति एवं साहित्य, जीवन शैली को प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक की भूमिका में श्री प्यारेलाल गुप्ता जी लिखते हैं – “वर्षो की पराधीनता ने हमारे समाज की जीवनशक्ति को नष्ट कर दिया है। फिर भी जो कुछ संभल पाया है, वह हमारे सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक उपादानों के कारण। नये इतिहासकारों को इन जीवन शक्तियों को ढूँढ़ निकालना है। वास्तव में उनके लिए यह एक गंभीर चुनौती है”


जानेन चेलिक भइन कन्हाई – छत्तीसगढ़ी कविता



लेखक – पं. सुन्दरलाल शर्मा

पं. सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ी कविता के प्रथम रचनाकार पंडित सुंदरलाल शर्मा जी है | जिन्होंने  छत्तीसगढ़ी भाषा का युग प्रवर्तक कवि माना जाता है। जिनका जन्म राजिम में सन् 1881 में हुआ था. जो स्वाधीनता संग्रामी थे, वे उच्च कोटी के कवि भी थे। शर्माजी ठेठ छत्तीसगड़ी में काव्य सृजन की थी। पं. सुन्दरलाल शर्मा को महाकवि कहा जाता है।

किशोरावस्था से ही सुन्दरलाल शर्मा जी लिखा करते थे। उन्हें छत्तीसगड़ी और हिन्दी के अलावा संस्कृत, मराठी, बगंला, उड़िया एवं अंग्रेजी आती ती।

हिन्दी और छत्तीसगड़ी में पं. सुन्दरलाल शर्मा ने 21 ग्रन्थों की रचना की। उनकी लिखी “छत्तीसगड़ी दानलीला” आज क्लासिक के रुप में स्वीकृत है।

श्याम से मिलने के लिए गोपियाँ किस तरह व्याकुल हैं, वह निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट होता है.

जानेन चेलिक भइन कन्हाई

तेकरे ये चोचला ए दाई।

नंगरा नंगरा फिरत रिहिन हे।

आजेच चेलिक कहाँ भइन हे।

कोन गुरु मेर कान फुँकाइना

बड़े डपोर संख बन आईन

दाई ददा ला जे नई माने।

ते फेर दूसर ला का जानै।


छत्तीसगढ़ के मझोस एक राजिम सहर – छत्तीसगढ़ी कविता


छत्तीसगढ़ के मझोस एक राजिम सहर,

जहां जतरा महीना मांघ भरेथे।

जहां जतरा महीना मांघ भरेथे।

देस देस गांव गांव के जो रोजगारी भारी,

माल असबाब बेंचे खातिर उतरथें।।

राजा और जमींदार मंडल-किसान

धनवान जहां जुर कै जमात ले निकरथे।

सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै एक

भाई! सनौ तहां कविताई बैठिकर

– पं. सुन्दरलाल शर्मा


एक जवानी उठती सबेक – छत्तीसगढ़ी कविता


एक जवानी उठती सबेक

पन्दा सोला बीस को

का आंजे अलंगा डारे।

मूड़ कोराये पाटी पारे।।

पांव रचाये बीरा खाये।

तरुवा में टिकली चटकाये।

बड़का टेड़गा खोपा पारे।

गोंदा खोंचे गजरा डारे।।

नगदा लाली मांग लगाये।

बेनी में फुंदरी लटकाये।।

टीका बेंदी अलखन बारे।

रेंगें छाती कुला निकारे।।

कोनो हैं, झाबा गंथवाये।

कोनो जुच्छा बिना कोराये।।

भुतही मन असन रेंगत जावै।

उड़ उड़ चुन्दी मुंह में आवै।।

पहिरे रंग रंग के गहना।

हलहा कोनों अंग रहे ना।।

कोनो गंहिया कोनो तोड़ी।।

कोनों ला घुंघरु बस भावै।।

छुमछुम छुमछुम बाजत जावै।

खुलके ककनी हाथ बिराजै।।

पहिरे बुहंटा अउ पछेला।

जेखर रहिस सीख है जेला।।

बिल्लोरी चूरी हरवाही।

स्तन पिंडरी अउ टिकलाही।।

कोनों छुच्छा लाख बंधाये।।

पिंडरा पटली ला झमकाये।।

पहिरे हे हरियर छुपाहीं।

कोनों छुटुवा कोनों पटाही।।

करघन कंवरपटा पहिरे रेंगत हाथी

जेमा ओरमत जात है, हीरा मोती

चांदी के सूता झमकाये

गोदना हांथ हांथ गोदवाये।।

दुलरी तिलरी कटवा मोहै

ओ कदमाही सुर्रा सोहे।।

पुतरी अऊर जुगजुगी माला।

रुपस मुंगिया पोत विशाला।।

हीरा लाल जड़ाये मुंदरी।

सब झन चक-चकर पहिरे अंगरी

पहिरे परछहा देवराही।

छिनी अंगुरिया अऊ अंगुराही।

खांटिल टिकली ढार बिराजै।

खिनवा लुरकी कानन राजै।।

तोखर खाल्हे झुमका झूलै।

देखत डउकन के दिल भूलै।।

नाकन में सुन्दर नाथ हालै।ं

नहिं कोऊ अ तोला के खालै।।

कोनों तिरिया पांव रचाये।

लाल महाडर कोनो देवाये।

चुटकी चुटका गोड़ सुहावै।

चुटचुट चुटचुट बाज जावै।।

कोनो अनवट बिछिया दानों।

दंग दंग ले लुच्छा है कोनों।।

रांड़ी समझें पांव निहारै।।

ऊपर एंह बांती मुंह मारै।।

दांतन पाती लाख लगाये।

कोनों मीसी ला झमकाये।।

एक एक के धरे हाथ हैं।

गिजगिज गिजगिज करत जाते हैं

– पं. सुन्दरलाल शर्मा


तोला देखे रहेंव गा, तोला देखे रहेंव रे – सीजी कविता



लेखक – पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र

पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी जी का जन्म सन् 1908 में बिलासपुर में हुआ था।

शुरु से ही उन्हें छत्तीसगढ़ के लोक परंपराओं और लोकगीतों में रुची थी। शुरु में ब्रजभाषा और खड़ी बोली में रचना करते थे। बाद में छत्तीसगढ़ी में लिखना शुरु किये।

उनकी प्रकाशित पुस्तके हैं – 1. कुछू कांही 2. राम अउ केंवट संग्रह 3. कांग्रेस विजय आल्हा 4. शिव-स्तुति 5. गाँधी गीत 6. फागुन गीत 7. डबकत गीत 8. सुराज गीता 9. क्रांति प्रवेश 10. पंचवर्षीय योजना गीत 11. गोस्वामी तुलसीदास (जीवनी) 12. महाकवि कालिदास कीर्ति 13. छत्तीसगढ़ी साहित्य को डॉ. विनय पाठक की देन।

विप्रजी प्रेम, ॠंगार, देशभक्ति, हास्य व्यंग्य सभी विषयों पर लिखी है।

तोला देखे रहेंव गा, तोला देखे रहेंव रे,

धमनी के हाट मां, बोइट तरी रे।

लकर धकर आये होही,

आँखी ला मटकाये।

कइसे जादू करे मोला

सुक्खा मां रिझाये।।

चुन्दी मां तैं चोंगी खोंचे

झुलुप ला बगराये।

चकमक अउ सोल मां तैंय

चोंगी ला सपचाये।।

चोंगी पीये बइठे बइठे

माड़ी ला लमाये।

घेरी बेरी देखे मोला,

दासी मां लोभाये।।

चना मुर्रा लिहे खातिक

मटक के तँय आये।

एक टक निहारे मोला

वही तँय बनाये।।

बोइर तरी बइठे बइहा,

चना मुर्रा खाये।

सुटुर सुटुर रेंगे कइसे

बोले न बताये।।

जात भर ले देखेंव तोला,

आँखी ला गड़ियाये।

भूले भटके तउने दिन ले

धमनी हाट नइ आये।।

तोला देखे रहेंव….


घाम-दिन गइस, आइस बरखा के दिन – सीजी कविता



लेखक – कोदूराम दलित 

कोदूराम दलित का जन्म सन् 1910 में जिला दुर्ग के टिकरी गांव में हुआ था।

गांधीवादी कोदूराम प्राइमरी स्कूल के मास्टर थे उनकी रचनायें करीब 800 (आठ सौ) है पर ज्यादातर अप्रकाशित हैं। कवि सम्मेलन में कोदूराम जी अपनी हास्य व्यंग्य रचनाएँ सुनाकर सबको बेहद हँसाते थे। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का प्रयोग बड़े स्वाभाविक और सुन्दर तरीके से हुआ करता था। उनकी रचनायें – 1. सियानी गोठ 2. कनवा समधी 3. अलहन 4. दू मितान 5. हमर देस 6. कृष्ण जन्म 7. बाल निबंध 8. कथा कहानी 9. छत्तीसगढ़ी शब्द भंडार अउ लोकोक्ति।

इनकी छत्तीसगढ़ी कविताओं में रचनाओं में छत्तीसगढ़ का गांव का जीवन बड़ा सुन्दर झलकता है

(1 )

घाम-दिन गइस, आइस बरखा के दिन

सनन-सनन चले पवन लहरिया।

छाये रथ अकास-मां, चारों खूंट धुंवा साही

बरखा के बादर निच्चट भिम्म करिया।।

चमकय बिजली, गरजे घन घेरी-बेरी

बससे मूसर-धार पानी छर छरिया।

भर गें खाई-खोधरा, कुंवा डोली-डांगर “औ”

टिप टिप ले भरगे-नदी, नरवा, तरिया।।

(2)

गीले होगे मांटी, चिखला बनिस धुरी हर,

बपुरी बसुधा के बुताइस पियास हर।

हरियागे भुइयां सुग्धर मखेलमलसाही,

जामिस हे बन, उल्होइस कांदी-घास हर।।

जोहत रहिन गंज दिन ले जेकर बांट,

खेतिहर-मन के पूरन होगे आस हर।

सुरुज लजा के झांके बपुरा-ह-कभू-कभू,

“रस-बरसइया आइस चउमास हर”।।

(3)

ढोलक बजायैं, मस्त होके आल्हा गाय रोज,

इहां-उहां कतको गंवइया-सहरिया,

रुख तरी जायें, झुला झूलैं सुख पायं अड,

कजरी-मल्हार खुब सुनाय सुन्दरिया।।

नांगर चलायं खेत जा-जाके किसान-मन,

बोवयं धान-कोदो, गावैं करमा ददरिया।

कभू नहीं ओढ़े छाता, उन झड़ी झांकर मां,

कोन्हो ओढ़े बोरा, कोन्हों कमरा-खुमरिया।।

(4)

बाढिन गजब मांछी, बत्तर-कीरा “ओ” फांफा,

झिंगरुवा, किरवा, गेंगरुवा, अँसोढिया।

पानी-मां मउज करें-मेचका, किंभदोल, धोंधी।

केंकरा, केंछुवा, जोंक मछरी अउ ढोंड़िया।।

अंधियारी रतिहा मां अड़बड़ निकलयं,

बड़ बिखहर बिच्छी, सांप-चरगोरिया।

कनखजूरा-पताड़ा, सतबूंदिया “ओ” गोेहेह,

मुंह लेड़ी, धूर, नांग, कंरायत कौड़ीया।।

(5)

भाजी टोरे बर खेत-खार “औ” बियारा जाये,

नान-नान टूरा-टूरी मन घर-घर के।

केनी, मुसकेनी, गुंड़रु, चरोटा, पथरिया,

मंछरिया भाजी लायं ओली भर भर के।।

मछरी मारे ला जायं ढीमर-केंवट मन,

तरिया “औ” नदिया मां फांदा धर-धर के।

खोखसी, पढ़ीना, टेंगना, कोतरी, बाम्बी धरे,

ढूंटी-मां भरत जायं साफ कर-कर के।।

(6)

धान-कोदी, राहेर, जुवारी-जोंधरी कपसा

तिली, सन-वन बोए जाथे इही ॠतु-मां।

बतर-बियासी अउ निंदई-कोड़ई कर,

बनिहार मन बनी पाथें इही ॠतु मां।।

हरेली, नाग पंचमी, राखी, आठे, तीजा-पोरा

गनेस-बिहार, सब आथें इही ॠतु मां।

गाय-गोरु मन धरसा-मां जाके हरियर,

हरियर चारा बने खायें इही ॠतु मां।।

(7)

देखे के लाइक रथे जाके तो देखो चिटिक,

बारी-बखरी ला सोनकर को मरार के।

जरी, खोटनी, अमारी, चेंच, चउंलई भाजी,

बोये हवें डूंहडू ला सुग्धर सुधार के।।

मांदा मां बोये हे भांटा, रमकेरिया, मुरई,

चुटचुटिया, मिरची खातू-डार-डार के।

करेला, तरोई, खीरा, सेमी बरबटी अउ,

ढेंखरा गड़े हवंय कुम्हड़ा केनार के।।

(8)

कभू केउ दिन-ले तोपाये रथे बादर-ह,

कभू केउ दिन-ले-झड़ी-ह हरि जाथे जी।

सहे नहीं जाय, धुंका-पानी के बिकट मार,

जाड़ लगे, गोरसी के सुखा-ह-आथेजी।।

ये बेरा में भूंजे जना, बटुरा औ बांचे होरा,

बने बने चीज-बस खाये बर भाथें जी।

इन्दर धनुष के केतक के बखान करौ,

सतरङ्ग अकास के शोभा ला बढ़ाये जी

(9)

ककरों चुहय छानी, भीतिया गिरे ककरो,

ककरो गिरे झोपड़ी कुरिया मकान हर,

सींड़ आय, भुइयां-भीतिया-मन ओद्य होयं,

छानी-ह टूटे ककरो टूटे दूकान हर।।

सरलग पानी आय-बीज सड़ जाय-अड,

तिपौ अघात तो भताय बोये धान हर,

बइहा पूरा हर बिनास करै खेती-पबारी,

जिये कोन किसिम-में बपुरा किसान हर?

(9)

बिछलाहा भुइयां के रेंगई-ला पूंछो झन,

कोन्हों मन बिछलथें, कोन्हों मन गरिथें।

मउसम बहलिस, नवा-जुन्ना पानी पीके,

जूड़-सरदी के मारे कोन्हों मन मरथें।।

कोन्हों मांछी-मारथे, कोन्हों मन खेदारथें तो,

कोन्हों धुंकी धररा के नावे सुन डरथें।

कोन्हों-कोन्हों मन मनमेन मैं ये गुनथे के

“येसो के पानी – ह देखो काय-काय करथें”।।

(10)

घर घर रखिया, तूमा, डोड़का, कुम्हड़ा के,

जम्मो नार-बोंवार-ला छानी-मां, चढ़ाये जी।

धरमी-चोला-पीपर, बर, गलती “औ”,

आमा, अमली, लोम के बिखा लगायै जी।।

फुलवारी मन ला सदासोहागी झांई-झूई,

किंरगी-चिंगी गोंदा पचरंगा-मां सजायं जी।

नदिया “औ” नरवा मां पूरा जहं आइस के,

डोंगहार डोंगा-मां चधा के नहकायं जी।।

(11)

घर घर रखिया, तूमा, डोड़का, कुम्हड़ा के,

जम्मो नार-बोंवार-ला छानी-मां, चढ़ाये जी।

धरमी-चोला-पीपर, बर, गलती “औ”,

आमा, अमली, लोम के बिखा लगायै जी।।

फुलवारी मन ला सदासोहागी झांई-झूई,

किंरगी-चिंगी गोंदा पचरंगा-मां सजायं जी।

नदिया “औ” नरवा मां पूरा जहं आइस के,

डोंगहार डोंगा-मां चधा के नहकायं जी।।

(12)

सहकारी खेती में ही सब के भलाई हवै,

अब हम सहकारिता – मां खेती करबो।

लांघन-भूखन नीरहन देन कंहूच-ला,

अन्न उपजाके बीता भर पेट भरबो।।

भजब अकन पेड़ – पउधा लगाबो हम,

पेड़-कटई के पाप करे बर उरबो।

देभा-ला बनाओ मिल-जुल के सुग्धर हम,

देश बर जीबो अउ देश बर मरबो।।


जब आइस बादर करिया – सीजी कविता , छत्तीसगढ़ी रचना


लेखक – श्यामलाल चतुर्वेदी

श्यामलाल चतुर्वेदी का जन्म सन् 1926 में कोटमी गांव, जिला बिलासपुर में हुआ था, वे छत्तीसगढ़ी के गीतकार भी हैं। उनकी रचनाओं में “बेटी के बिदा” बहुत ही जाने माने हैं। उनको बेटी को बिदा के कवि के रुप में लोग ज्यादा जानते हैं। उनकी दूसरी रचनायें हैं – “पर्रा भर लाई”, “भोलवा भोलाराम बनिस”, “राम बनबास” ।

वे पत्रकारिता भी करते हैं। “विप्रजी” से उन्हें बहुत प्रेरणा मिली थी। और बचपन में अपनी मां के कारण भी उन्हें लिखने में रुची हुई। उनकी मां नें बचपन में ही उन्हें सुन्दरलाल शर्मा के “दानलीला” रटा दिये थे। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ी साहित्य के मूल, छत्तीसगढ़ की मिट्टी, वहाँ के लोकगीत, लोक साहित्य। उनकी “जब आइस बादर करिया” जमीन से जुड़ी हुई है –

जब आइस बादर करिया

तपिस बहुत दू महिना तउन सुरुज मुंह तोपिस फरिया।

रंग ढंग ला देख समे के, पवन जुड़ाथे तिपथे।

जाड़ के दिन म सुर्श हो आंसू ओगार मुंह लिपाथे।

कुहूक के महिना सांझ होय, आगी उगलय मनमाना

तउने फुरहूर-सुधर चलिस, बनके सोझुआ अनजाना,

राम भेंट के संवरिन बुढिया कस मुस्क्याइस तरिया,

जब आइस बादर करिया

जमो देंव्ह के नुनछुर पानी

बाला सोंत सुखोगे।

थारी देख नानकुन लइका

कस पिरथिबे भुखोगे।

मेंघराज के पुरुत के

उझलत देइन गुढ़बा

“हा ददा बांचगे जीव”

कहिन सब डउकी लइकन बुढ़बो

“नइ देखेन हम कभू ऐसो कस,

कुहूक न पुरखा परिया”

जब आइस बादर करिया

रात कहै अब कोन दिनो मा

सपटे हय अंधियारी

सूपा सही रितोवय बादर

अलमल एक्केदारी

सुरुज दरस के कहितिन कोनो

बात कहाँ अब पाहा।

‘हाय हाय’ के हवा गईस

गूंजिस अब “ही ही” “हा हा”

खेत खार मा जगा जगा

सरसेत सुनाय ददरिया

जब आइस बादर करिया

का किसान के मुख कइहा,

बेटवा बिहाव होय जइसे।

दौड़ धूप सरजाम सकेलंय,

कास लगिन होय अइसे।।

नागंर नहना बिजहा बइला

जोंता अरइ तुतारी।

कांवर टुकना जोर करय

धरती बिहाव केत्यरी।।

बर कस बिजहा छांट पछिंनय

डोला जेकर काँवर।

गोद ददरिया भोजली के गावै मिल जोड़ी जाँवर।।

झेगुंरा धरिस सितार किंभदोलवा मिरदंग मस्त बजावै।

बादर ठोंक निसान बिजुलिया छुरछुरिया चमकावै।

राग पाग सब माढ़ गइस हे जमगे जम्मो धरिया।।

जब आइस बादर करिया

हरियर लुगरा धरती रानी

पहिर झमक ले आइसे।

घेरी भेरा छिन छिन आंतर मां

तरबतर नहाइस।।

कुँड़ के चऊँक पुराइस ऐसी

नेंग न लगे किसानिन

कुच्छु पुछिहा बुता के मारे

कहिथें “हम का जानिन”।।

खाली हांथ अकाम खड़े अब कहाँ एको झन पाहा?

फरिका तारा लगे देखिहा,

जेकेर धर तूं जाहा।

हो गये हे बनिहार दुलभ सब

खोजंय खूब सफरिया

जब आइस बादर करिया।।

पहरी मन सो जाके अइसे

बादर घिसलय खेलय

जइसे कोइलारी के पोनी

जा गोहनाय ढपेलय

मुचमुचही के दांत सही बिजली चमकच अनचेतहा

जगम ले आंखी बरय मुंदावै, करय झड़ी सरसेत हा।।

तब गरीब के कुलकुत मातय,

छानही तर तर रोवय।

का आंसू झन खगे समझ के

अघुवा अबड़ रितोवय।।

अतको म मन मारै ओहर

लोरस नावा समे के

अपन दुक्ख के सुरता कहाँ

भला हो जाय जमेके।।

सुख के गीद सुनावै

“तरि नरि ना, मोरिना, अरि आ”,

जब आइस बादर करिया।


CG Poem in Hindi – New CG Kavita


कलयुग मा पाप बढ़े ,
अऊ मनखे करे  अत्याचार

मॉ बाप ला मारके बेटा ,
दुरिया ले करे धुतकार

मॉ बाप के सेवा करके,
पाबे  सरग के दुवार

मॉ बाप के सेवा करईय्या ,
नई मिले श्रवन कुमार

हाय राम पापी कल्युग के रचना ला
रचे तैं काबर

मनखे मन के अत्यचार देखके,
कलपे अंतस हा माेर 

कलयुग के नाश करे बर,
कब लेबे कलंकनि अवतार

प्रहलाद पुरबिया परे पईय्या,
सिरि राम पालनहार

|| CG kavita ||


Chhattisgarhi Poetry on Life – CG Poem 2021


जय हो तोर नेट”

मोबाईल के जमाना हे, 

चलत हे भारी नेट! 

एकर चक्कर मा भात घलो, 

नइ खवावय भर पेट! 

आठोकाल बारो महीना, 

आषाण सावन जेठ! 

उठत बईठत रेंगत दउड़त, 

घंसत घंसत कोलगेट! 

नई छोड़न मोबाइल ला, 

भले डिपटी मा हो जय लेट! 

सब झन लगे हे मोबाईल मा, 

गरीब होवय चाहे सेठ! 

डोकरा बबा घलो हाथ उठाके, 

खोजथे मोबाईल मा नेट! 

कभू चढंहत हे अटरिया ता, 

कभू चढ़हत हे गेट! 

एकर चक्कर मा ले बर पडगे, 

मँहगा वाला हेंडसेट! 

जय हो तोर नेट! 

जय हो तोर नेट! 
|| CG kavita ||


Chhattisgarhi hasya Kavita – Chhattisgarhi Poems


दस पईसा के स्याही भरावन
पॉच पईसा म बत्ती
खम्भा-खम्भा घोंस-घोंस के
कर देन ओला चोक्खी
.
बोरी के बस्ता सिलवावन
बोरी ल बनावन छाता
बईठे बर बोरी ले जावन
बेंच कहॉ ले पाता
.
गुरूजी के जब परै चामटी
विद्या झम-झम आवै
दाई-ददा के चलै कुटाई
टिवसन कोन पढावै
.

डेढ बजे त भात खा ले
स्कूल जाय बर बासी
चाऊमीन चोचला छोड दे बाबू
रोटी रहय उपासी
.
बेरा बर ओरिया छॉव देखन
छुट्टी बर देखन खईखा
टीवी मोबाईल कहॉ जी संगी
खेलन लईके लईका
.

का नरवा का खेत-खार
का ठंडा का तात
मजे-मजा म रहे जमो झन
अब तईहा होगे बात
|| CG kavita ||


Chhattisgarhi hasya Kavita – CG Kavita


चाल बिगाड़े मोटर भैया
आदत बिगाड़े होटल.ग

आजकल  के संगी जहुरिया ल, बिगाड़े महुआ के बोतल ग,
टीवी सही मोर देवता नीये ,
पेपर सही पूरान,

दारू सही अमरीत नीये,
जेला पिये लईका सियान

गानजा माँगे चना चबेला,
भांगे माँगे घी ,
दारू माँगे जूता चप्पल
तै सोच समझ के पी 


Best CG Kavita 2021


गजब मिठाथे रे संगी, मोर छत्तीसगड़ के बासी.

ईही हमर बर तिरिथ गंगा, ईही हमर बर मथरा कासी.

उठथन बिहनिया करथन मुखारी, अउ झडक थन बासी.

दिन भर करथन काम बुता , पेट नई होवय खाली.

दार दरहन के कामे नईये, नई लगाय साग तरकारी.

दही मही संग नुन मिर्चा, गोन्दली येकर सन्ग्वारी.

के दिन ले बनाबो माल पुआ, के दिन ले बनाबो तसमई पुरी.

कतका ला बिसाबो सेव डालीया , के दिन ले खाबो सोहारी.

समोसा, जलेबी, पोहा, खोआ, रसगुल्ला नइ मिठावय हमला.

नई खाए सकन होटल के रोज, तेलहा, फुलहा भजिया.

सहरिया मन के नकल जो करबो, होजाहि जग हासि.

सबले सस्ता सबले बढीया , मोर छत्तीसगढ के बासी .

“”जय छत्तीसगढ””
|| CG kavita ||


CG Poem in Hindi – छत्तीसगढ़ी कविता


”मोर गांव कहां गंवागे”

मोर गांव कहां गंवागे संगी, कोनो खोज के लावो

भाखा बोली सबो बदलगे, मया कहां में पावों,

काहनी किस्सा सबो नंदागे, पीपर पेड़ कटागे

नइ सकलाये कोनों चंउरा में, कोयली घलो उड़ागे,

सुन्ना परगे लीम चंउरा ह, रात दिन खेलत जुंवा

दारु मउहा पीके संगी, करत हे हुंवा हुंवा,

मोर अंतस के दुख पीरा ल, कोन ल मय बतावों

मोर गांव कहां गंवागे संगी, कोनो खोज के लावो

जवांरा भोजली महापरसाद के, रिसता ह नंदागे

सुवारथ के संगवारी बनगे, मन में कपट समागे

राम राम बोले बर छोड़ दीस, हाय हलो ह आगे

टाटा बाय बाय हाथ हलावत, लइका स्कूल भागे,

मोर मया के भाखा बोली, कोन ल मय सुनावों

मोर गांव कहां गंवागे संगी, कोनो खोज के लावो,

छानी परवा सबो नंदावत, सब घर छत ह बनगे

बड़े बड़े अब महल अटारी, गांव में मोर तनगे

नइहे मतलब एक दूसर से, शहरीपन ह आगे

नइ चिनहे अब गांव के आदमी, दूसर सहीं लागे,

लोक लाज अऊ संसक्रिती ल, कइसे में बचावों,

मोर गांव कहां गंवागे संगी, कोनो खोज के लावो

धोती कुरता कोनों नइ पहिने, पहिने सूट सफारी

छल कपट बेइमानी बाढ़गे, मारत हे लबारी

पच पच थूंकत गुटका खाके, बाढ़त हे बिमारी

छोटे बड़े कोनों मनखे के, करत नइहे चिन्हारी,

का होही भगवान जाने अब, कोन ल मय गोहरावों,

मोर गांव कहां गंवागे संगी, कोनो खोज के लावो

जगा जगा लगे हाबे, चाट अंडा के ठेला

दारु भटठी में लगे हाबे, दरुहा मन के मेला

पीके सबझन माते हाबे, का गुरु अऊ चेला

लड़ई झगरा होवत हाबे, करत हे बरपेला,

बिगड़त हाबे गांव के लइका, कइसे में समझावों

मोर गांव कहां गंवागे संगी, कोनो खोज के लावो,,
|| CG kavita ||


छत्तीसगढ़ी हास्य कविता – दस पईसा के स्याही


दस पईसा के स्याही भरावन
पॉच पईसा म बत्ती
खम्भा-खम्भा घोंस-घोंस के
कर देन ओला चोक्खी
.
बोरी के बस्ता सिलवावन
बोरी ल बनावन छाता
बईठे बर बोरी ले जावन
बेंच कहॉ ले पाता
.
गुरूजी के जब परै चामटी
विद्या झम-झम आवै
दाई-ददा के चलै कुटाई
टिवसन कोन पढावै
.

डेढ बजे त भात खा ले
स्कूल जाय बर बासी
चाऊमीन चोचला छोड दे बाबू
रोटी रहय उपासी
.
बेरा बर ओरिया छॉव देखन
छुट्टी बर देखन खईखा
टीवी मोबाईल कहॉ जी संगी
खेलन लईके लईका
.

का नरवा का खेत-खार
का ठंडा का तात
मजे-मजा म रहे जमो झन
अब तईहा होगे बात
|| CG kavita ||


छत्तीसगढ़ी मजेदार हास्य कविता – झूठ तो मैं बोलव नहीं,


????झूठ तो मैं बोलव नहीं,
अउ सच मोला आय नहीं।।।

????भात मैं खाँव नहीं,

बासी मोला सुहाय नहीं।।।

????छत्तीसगढ़ मा शासन हे,

फेर २ रूपिया किलो रासन हे,

????कहिथे कुछ, करथे कुछ,

अइसन ओखर भासन हे।।।

????अइसन लबरा नेता मन के,
गोठ ह सुहाय नहीं,

????झूठ तो मैं बोलव नहीं,
सच मोला आय नहीं।।।••••••

????सर्वशिक्षा अभियान चलत हे,

खेतखार ल बेच पढत हे।।।

????लटपट एक ठन नौकरी के भेकेंसी,

ता अढ़ई हजार झन फारम भरत हें।।।।

बिन तनखा गुरूजी कर्जा मा बुड्गे,
तेखरे ले आजकल पढाय नहीं।

????झूठ तो मैं बोलव नहीं,
सच मोला आय नहीं।।।••••••

????लइका पढ लिख के सुखियार होगे,

गाॅव गली म हीरो बन घूमत हे।।।।

????????छेरी भईसा  बेचे ल परगे,
लईका ओला चराय नहीं

????जेखर सिफारिस नइहे,
तेखर नौकरी आय नहीं।।

????झूठ तो मैं बोलव नहीं,
सच मोला आय नहीं।।।••••••

????बिन दाई के परसे, आऊ बिन मेघा के बरसे।।।।

भुइयाँ के पियास,बुझाय नहीं।।।।

????झूठ तो मैं बोलव नहीं,

आऊ सच मोला आय नहीं।।

????जय छत्तीसगढ़ महतारी  ????


CG Kavita –  वाह रे मोर छत्तीसगढ


वाह रे मोर छत्तीसगढ के ….

एक रूपिया किलो म चाऊर मिलथे उही ल खाके जीना हे

एक दिन चाऊर बर कमाना हे त बाकी ल कूद कूद के पीना हे
जवानी के राहत ले कूद कूद के घूमना हे॥

डोकरा हो जाबो त का हे निराशी तो मिलना हे

घर म नई हे खाये बर दाना दारू बर चाऊर ल बेचत हे ॥

दारू ल पिके ओहा डऊकी लईका ल पिटत हे

वाह रे मोर छत्तीसगढ के नव- युवा लइका

काम बुता करना नई हे बीत्ता भर के जबान
     
जय श्री राम

|| छत्तीसगढ़ी कविता सीजी कविता ||


Chhattisgarhi hasya Kavita – छत्तीसगढ़ी हास्य कविता 2021


घुमेबर चलदेंव मेंह एकदिन गउ दारु भट्ठी म
का मोहनी डराय रथे बाटल अदधी अउ चपटी म

देखेव जाके जब अनर बनर
पियत बइठे सब जतर कतर
चांटत रहे नुन पीये के हे धुन
चाबवत चना ल कटर कटर

चलायके नंइहे सकति फेर चड़के जावै फटफट्टी म
का मोहनी डराय रथे बाटल अदधी अउ चपटी म

सुआरी लइका के मोह नंइहे
दानापानी के थोर संसो नंइहे
लगेहे लत इंहां पियकड़ु के
कोनों चाहे अब कहीं कइहे

पीयेबर पइसा निही त पइसा भिड़ाय चोरकट्टी म
का मोहनी डराय रथे बाटल अदधी अउ चपटी म

हर पियकड़ु जेब म अधार धरथे
पइसा नी रही जोगड़ कोनो करथे
संगवारी खोजथे पियकड़ु अपन
जीते जीयत पीही पीते पीयत मरथे

अलप समय पियइया ल जात देखेव मरघट्टी म
का मोहनी डराय रथे बाटल अदधी चपटी म

|| छत्तीसगढ़ी हास्य कविता ||


छत्तीसगढ़ी कविता – झन रो संगवारी झन रो भाई


झन रो संगवारी झन रो भाई

एक दीन हमरो आही रे

लंईका पन हवन त दूख ल झेलबो

हमरो दीन आही त हमु मन बोलबो

कब तक रही गरीबी हमर साथ रे

चुप हो जा मोर भाई चुप हो जा रे

हमर दाई ददा ह भले छोड़ दे हवय

परे हन डहर म हमर संग भगवान हवय

झन डरा ना भाई झन डरा ना रे

बड़े होहु ताहन तोला पढ़ाहु

पढ़ा लिखा के जग म नाम कमाहु

भले मोर जिनगी खुवार हो जय

फेर दुनिया म होहय तोर जय

झन रो मोर भाई झन रो ना रे

मेहनत मजदुरी हमर नसीब हवय

नई करन देवव मेहनत मजदुरी रे

कंईसन रहीस हमर दाई ददा

रसता डहर म छोड़ दीस हवय

झन डरा मोर भाई झन झन डरा रे

पढ़ लिख लेबे तहन बाबु साहेब बनबे

झन भुलाबे हमर गरीबी के दीन रे

हमर असन गरीब के संग देबे

झन करबे अमीरी के घमंड रे

झन करबे अमीरी के घमंड रे

झन रो मोर भाई झन रो ना रे

|| छत्तीसगढ़ी कविता ||


छत्तीसगढ़ी कविता 2021 – CG KAVITA


अब के बरस बाबुल नाहि आइहैं,

तीजा पोरा कइसे, मनाइहौं रे।

आपन भइया की छोटी सी मुनियाँ,

अँखियन कइसे समुझाइहौं रे।

तीजा पोरा कइसे, मनाइहौं रे,,,,,,,,,।

बैरन  कॅरोना ने  साध बुताई,

बाबुल अँगना से लगन छुड़ाई।

रहि-रहि अँसुअन नैनन बरसे,

माई की अँखियन मोरे बिन तरसे।

नैहर कइसे मैं आइहौं रे,,,,,,

अब के बरस बाबुल नाहि आइहैं,

तीजा-पोरा कइसे , मनाइहौं रे,,,,

|| CG KAVITA ||

#FAQ About Chhattisgarhi Kavita

छत्तीसगढ़ी कविता के प्रथम रचनाकार कौन थे ?

छत्तीसगढ़ी कविता के प्रथम रचनाकार पंडित सुंदरलाल शर्मा जी थे जिन्होंने छत्तीसगढ़ी कविता की सबसे पहले रचना की थी | जिन्हे छत्तीसगढ़ी भाषा का युग प्रवर्तक कवि माना जाता है।

हमर कतका सुन्दर गाँव के लेखक कौन है?

हमर कतका सुन्दर गाँव छत्तीसगढ़ी कविता के लेखक – श्री प्यारेलाल गुप्ता जी है |

प्यारेलाल गुप्ता जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

श्री प्यारेलाल गुप्ता जी का जन्म सन् 1948 में रतरपुर में हुआ था।

प्यारेलाल गुप्ता जी के साहित्यिक कृतियो के नाम?

श्री प्यारे लाल गुप्ता जी के साहित्यिक कृतियाँ के नाम – 1. प्राचीन छत्तीसगढ़ 2. बिलासपुर वैभव 3. एक दिन 4. रतीराम का भाग्य सुधार 5. पुष्पहार 6. लवंगलता 7. फ्रान्स राज्यक्रान्ति के इतिहास 8. ग्रीस का इतिहास 9. पं. लोचन प्रसाद पाण्डे।

पं. सुन्दरलाल शर्मा का जन्म कब हुआ था?

पं. सुन्दरलाल शर्मा का जन्म राजिम में सन् 1881 में हुआ था.

Treading

#CG SHAYARI CG Birthday Wishesh

जन्मदिन के गाड़ा - गाड़ा बधाई हो मोर भाई सदैव आप मन के उपर महादेव के कृपा अउ आशीर्वाद बने रहाए ''CG Birthday Shayari''

#CG SHAYARI cg chutkule cg funny jokes chhattisgarhi jokes

कभू कभू मन के बात ला बताए ला लगथे, कभू-कभू मया मे खिसीयाय ला लगथे, कभू तो मैसेज कर दे करव संगवारी.. एकरो बर तुमन ला जोजीयाय ला लगथे। ????????????????????

#CG SHAYARI CG LOVE SHAYARI

करले तै भरेसा संगी मन म तोला बसाहुँ। आँखि आँखि म झूलत रथस रानी तोला बनाहुँ। ''छत्तीसगढ़ी लव शायरी''

#CG SHAYARI Chhattisgarhi taali Shayari

कइसे बइठे हौ अल्लर असन,थोरकन अपन मया दिखावा।परस्तुती पसन्द आइस हो ही त, ताली तो जरूर बजावा।। ???? ???? ???? ????

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